📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Department of Archaeology & Museums, Government of
बिज़नेस
दीपावली की रौशनी के बदलाव से राजस्थान के केकड़ी के कुम्हारों पर असर
✍️ Amar Ujala · Rajasthan
🗓 06 नव. 2026, 03:36 PM
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दीपावली के करीब आते ही सजावटी इलेक्ट्रिक लाइटों की बढ़ती मांग ने केकड़ी के कुम्हारों की मिट्टी की दीयों की बिक्री घटा दी है।
जैसे ही दीपावली नज़दीक आती है, सजावटी रंग‑बिरंगी इलेक्ट्रिक लाइटों की मांग में तेज़ी आई है, जिससे राजस्थान के केकड़ी क्षेत्र में पारंपरिक मिट्टी की दीयों की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है। स्थानीय विक्रेताओं ने बताया कि इन हाथ से बने दीयों की ऑर्डर में स्पष्ट कमी आई है, जबकि ये दीये दशकों से त्यौहार की सजावट का अभिन्न हिस्सा रहे हैं।
केकड़ी के कुम्हारों ने कहा कि उनका मुख्य आय स्रोत मौसमी रूप से इन दीयों की बिक्री पर निर्भर करता है, और अब इस आय में कमी के कारण उनके पास बचे हुए माल और कम नकदी प्रवाह का सामना करना पड़ रहा है। LED और बैटरी‑चलित लाइटों की सुविधा और टिकाऊपन ने उपभोक्ताओं की पसंद बदल दी है, लेकिन इससे कई कुम्हारों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति उत्तर भारत में व्यापक रूप से देखी जा रही है, जहाँ आधुनिक प्रकाश विकल्पों को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, मिट्टी की दीयों की बिक्री में गिरावट छोटे‑स्तर के कुम्हारों की आजीविका को खतरे में डाल रही है, क्योंकि उनके पास वैकल्पिक बाजार सीमित हैं।
कुम्हारों के संघ स्थानीय अधिकारियों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे पारंपरिक दीपावली वस्तुओं को आधुनिक सजावट के साथ प्रदर्शित करने के लिए प्रचारात्मक योजनाएँ या मेले आयोजित करें, जिससे विरासत शिल्प को आधुनिक मांग के साथ संतुलित किया जा सके।
केकड़ी के कुम्हारों ने कहा कि उनका मुख्य आय स्रोत मौसमी रूप से इन दीयों की बिक्री पर निर्भर करता है, और अब इस आय में कमी के कारण उनके पास बचे हुए माल और कम नकदी प्रवाह का सामना करना पड़ रहा है। LED और बैटरी‑चलित लाइटों की सुविधा और टिकाऊपन ने उपभोक्ताओं की पसंद बदल दी है, लेकिन इससे कई कुम्हारों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति उत्तर भारत में व्यापक रूप से देखी जा रही है, जहाँ आधुनिक प्रकाश विकल्पों को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, मिट्टी की दीयों की बिक्री में गिरावट छोटे‑स्तर के कुम्हारों की आजीविका को खतरे में डाल रही है, क्योंकि उनके पास वैकल्पिक बाजार सीमित हैं।
कुम्हारों के संघ स्थानीय अधिकारियों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे पारंपरिक दीपावली वस्तुओं को आधुनिक सजावट के साथ प्रदर्शित करने के लिए प्रचारात्मक योजनाएँ या मेले आयोजित करें, जिससे विरासत शिल्प को आधुनिक मांग के साथ संतुलित किया जा सके।